Wednesday, 20 June 2012

सुनों चाण्क्य...........


दिव्य स्वप्न, सम्भावना, भास्कर
अखंड भारत का,
जो तुमने देखा,
तुम मुर्ख थे

आज हजारों है
दीमकें, चाटती हुई जड़े
आम्विकुमार, धनानंद, अलेक्षेन्द्र भी
अब कहो क्या करें

तुम्हारी सम्भावना के आकार
तुम्हारे स्वप्नों के आधार
दे रहे है आवाज़ें
जागों, मार्ग दिखाओ
लड़ो, फिर कहो
उत्तिष्ठ भारतः ...........

सुनों,  
हजारों चन्द्रगुप्त ललकार रहे है
चाण्क्य, तुम्हे गुरुकुल पुकार रहे है .............
~अज़ीम